मौसम
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मेरे महबूब!
कितने मौसम आए
और
आकर गुज़र गए
लेकिन
मैं आज भी
उम्र की तपती दोपहरी में
खडी़ हूं
तुम्हारे इंतज़ार में...
*-डॉ. फ़िरदौस ख़ान*
रविवार, अगस्त 15, 2010
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